सवांददाता : सुबी सिंह
पटना। बिहार के बहुचर्चित टेंडर किंग रिशु श्री प्रकरण में एक नया और अहम मोड़ सामने आया है। मामले में आरोपी बनाए गए और लंबे समय से विवादों में घिरे वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संजीव हंस ने निगरानी विभाग और विशेष निगरानी इकाई (SVU) को एक विस्तृत पत्र भेजकर अपने खिलाफ दर्ज प्राथमिकी पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनके इस पत्र के सामने आने के बाद प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।
सूत्रों के अनुसार, संजीव हंस ने अपर मुख्य सचिव, निगरानी विभाग तथा विशेष निगरानी इकाई के एडीजी को संबोधित पत्र में दावा किया है कि उन्हें बिना पर्याप्त साक्ष्य और बिना किसी ठोस प्रारंभिक जांच के अभियुक्त बनाया गया है। उन्होंने पूरे मामले को तथ्यों के विपरीत बताते हुए जांच प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं।
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
अपने पत्र में संजीव हंस ने उल्लेख किया है कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा वर्ष 2024 में दर्ज की गई ECIR का आधार रूपसपुर थाना कांड संख्या 18/2023 था। उनका कहना है कि इस मूल प्राथमिकी को पटना हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया था। इसके बाद संबंधित मामले में दायर अपील को भी सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया।
संजीव हंस का तर्क है कि जब मूल मामला ही न्यायालय द्वारा समाप्त कर दिया गया, तब उन्हीं तथ्यों और आरोपों के आधार पर नई प्राथमिकी दर्ज कर उन्हें आरोपी बनाना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। उन्होंने इस कार्रवाई को कानूनी दृष्टि से भी सवालों के घेरे में बताया है।
“कोई ठोस साक्ष्य नहीं, फिर भी बना दिया गया आरोपी”
पत्र में आईएएस अधिकारी ने यह भी आरोप लगाया है कि विशेष निगरानी इकाई को जो सूचनाएं उपलब्ध कराई गईं, उनमें केवल यह बताया गया कि उनके कार्यकाल के दौरान कुछ कंपनियों को टेंडर आवंटित किए गए थे। हालांकि किसी भी दस्तावेज में यह नहीं दर्शाया गया कि टेंडर प्रक्रिया में कोई अनियमितता हुई, किसी नियम का उल्लंघन किया गया या किसी प्रकार का भ्रष्टाचार हुआ।
उन्होंने कहा कि किसी भी अधिकारी के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने से पहले यह आवश्यक है कि उसके विरुद्ध प्रथम दृष्टया ठोस साक्ष्य मौजूद हों। लेकिन उनके मामले में ऐसा नहीं किया गया और सीधे प्राथमिकी में नाम शामिल कर दिया गया।
टेंडर प्रक्रिया पर भी दी सफाई
संजीव हंस ने अपने पत्र में बिहार लोक निर्माण विभाग (PWD) की निविदा प्रक्रिया का विस्तार से उल्लेख किया है। उन्होंने कहा कि विभागीय नियमों के अनुसार 350 लाख रुपये से अधिक की निविदाओं का अंतिम निर्णय विभागीय निविदा समिति (Departmental Tender Committee) द्वारा लिया जाता है।
उनका कहना है कि सचिव की भूमिका केवल समिति के अध्यक्ष की होती है और कोई भी निर्णय सामूहिक रूप से लिया जाता है। ऐसे में किसी एक अधिकारी को पूरी प्रक्रिया के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराना नियमों और प्रशासनिक परंपराओं के अनुरूप नहीं है।
विश्व बैंक की परियोजनाओं का भी जिक्र
पत्र में संजीव हंस ने उन परियोजनाओं का भी उल्लेख किया है जिनमें विश्व बैंक की वित्तीय भागीदारी थी। उन्होंने कहा कि विश्व बैंक पोषित परियोजनाओं में निविदा प्रक्रिया बेहद पारदर्शी और बहुस्तरीय होती है।
तकनीकी मूल्यांकन, वित्तीय मूल्यांकन, विभागीय अनुमोदन और विभिन्न समितियों की समीक्षा के बाद ही किसी एजेंसी को कार्य आवंटित किया जाता है। इसके अलावा विश्व बैंक के दिशा-निर्देशों का भी पालन किया जाता है। ऐसे में किसी एक अधिकारी पर अनियमितता का आरोप लगाना पूरी प्रक्रिया की वास्तविकता को नजरअंदाज करने जैसा है।
जांच एजेंसियों की कार्रवाई पर उठे सवाल
संजीव हंस के इस पत्र के सामने आने के बाद एक बार फिर जांच एजेंसियों की कार्रवाई को लेकर बहस शुरू हो गई है। पत्र में उन्होंने संकेत दिया है कि उनके खिलाफ दर्ज मामला पर्याप्त तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित नहीं है। वहीं दूसरी ओर जांच एजेंसियां पहले ही रिशु श्री प्रकरण में बड़े पैमाने पर आर्थिक अनियमितताओं और कथित भ्रष्टाचार की जांच कर रही हैं।
क्या है रिशु श्री मामला?
रिशु श्री को बिहार में कथित तौर पर “टेंडर किंग” के नाम से जाना जाता है। उन पर सरकारी परियोजनाओं और ठेकों से जुड़े कई गंभीर आरोपों की जांच चल रही है। इसी जांच के दौरान कई अधिकारियों और अन्य लोगों के नाम भी सामने आए थे, जिनमें संजीव हंस का नाम भी शामिल किया गया।
आगे क्या?
अब संजीव हंस के पत्र ने पूरे मामले को नया आयाम दे दिया है। एक ओर जहां उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को चुनौती देते हुए जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, वहीं दूसरी ओर निगरानी विभाग और विशेष निगरानी इकाई की जांच भी जारी है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच एजेंसियां उनके पत्र में उठाए गए बिंदुओं पर क्या रुख अपनाती हैं और इस बहुचर्चित मामले में आगे क्या कानूनी घटनाक्रम सामने आता है।
फिलहाल, संजीव हंस के इस पत्र ने बिहार के प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है तथा रिशु श्री प्रकरण एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।

