Patna High Court: बिहार के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी से जुड़े मामले में पटना हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने करीब चार दशक तक सरकारी विभाग में काम करने वाले कर्मचारी की पुरानी सेवा को नजरअंदाज कर उसे नई नियुक्ति मानने वाले विभागीय आदेशों को रद्द कर दिया। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को पेंशन, वेतन संरक्षण और पुरानी सेवा की गणना के मामले में तीन महीने के भीतर नियमानुसार फैसला लेने का निर्देश दिया है।
मामला जल संसाधन विभाग, समस्तीपुर से जुड़ा है। पूर्वी चंपारण निवासी विपिन कुमार वर्मा ने वर्ष 1980 में विभाग में दैनिक वेतनभोगी के तौर पर काम शुरू किया था। करीब 32 वर्षों तक लगातार सेवा देने के बाद 5 दिसंबर 2012 को उन्हें निम्न वर्गीय लिपिक के पद पर नियमित किया गया।
हालांकि, विभाग ने इस नियमितीकरण को उनकी पुरानी सेवा की निरंतरता मानने के बजाय नई नियुक्ति के तौर पर माना। इसका सीधा असर उनके वेतन पर पड़ा। उनका मूल वेतन 9,840 रुपये से घटकर 7,730 रुपये हो गया।
मामला यहीं नहीं रुका। नवंबर 2019 में सेवानिवृत्त होने के बाद उनकी वर्ष 1980 से 2012 तक की सेवा को पेंशन संबंधी लाभों के लिए नहीं जोड़ा गया। इसके बाद उन्होंने अपने अधिकारों को लेकर पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सरकार की दलील पर कोर्ट ने जताई असहमति
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि दैनिक वेतनभोगी के तौर पर की गई सेवा को पेंशन या अन्य सरकारी प्रयोजनों के लिए सेवा अवधि नहीं माना जा सकता। सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि वर्ष 2012 में कर्मचारी ने बिना किसी शर्त के नई नियुक्ति स्वीकार की थी, इसलिए अब वह अपनी पुरानी सेवा को जोड़ने की मांग नहीं कर सकते।
लेकिन कोर्ट इस तर्क से सहमत नहीं हुआ।
जस्टिस कुमार मनीष की एकल पीठ ने राज्य सरकार और समस्तीपुर के मुख्य अभियंता के रुख को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने अपने आदेश में राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारियों और कर्मचारी के लंबे सेवाकाल को महत्व दिया।
जूनियर कर्मचारियों को लाभ, तो याचिकाकर्ता को क्यों नहीं?
सुनवाई के दौरान एक अहम तथ्य यह भी सामने आया कि समस्तीपुर अंचल में याचिकाकर्ता से कनिष्ठ कर्मचारियों—महेश राय, दिलीप कुमार राय और बिपिन कुमार सिंह—को 1988 से काल्पनिक नियमितीकरण और पेंशन संबंधी लाभ दिए गए थे।
वहीं, विपिन कुमार वर्मा को समान परिस्थितियों में इन लाभों से वंचित रखा गया।
कोर्ट ने इस अंतर को संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के अधिकार के संदर्भ में गंभीरता से देखा।
अदालत ने माना कि लंबे समय तक कर्मचारी से सेवा लेने के बाद उसकी पुरानी सेवा को पूरी तरह नजरअंदाज करने का सवाल उठता है, खासकर तब जब समान परिस्थितियों वाले अन्य कर्मचारियों को लाभ दिया गया हो।
विभागीय आदेश पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक
हाईकोर्ट ने समस्तीपुर के मुख्य अभियंता और अधीक्षण अभियंता की ओर से जारी उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनके जरिए कर्मचारी के वेतन संरक्षण और पुरानी सेवा को जोड़ने के दावे को खारिज किया गया था।
कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे तीन महीने के भीतर मामले पर दोबारा विचार करें और एक स्पष्ट तथा कारणयुक्त आदेश पारित करें।
इसमें कर्मचारी की पेंशन, बिहार सेवा संहिता के नियम-78 के तहत वेतन संरक्षण और वर्ष 1980 से की गई पुरानी सेवा की गणना से जुड़े दावे पर नियमानुसार निर्णय लेना होगा।
चार दशक की सेवा के बाद कोर्ट का सख्त संदेश
इस फैसले से साफ है कि सरकारी सेवा से जुड़े मामलों में केवल विभागीय आदेश या किसी तकनीकी आधार पर कर्मचारी की लंबी सेवा को नजरअंदाज करने का मामला अदालत की जांच से गुजर सकता है।
पटना हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के धर्म सिंह (2025) और भीखनी देवी (2026) मामलों का भी हवाला दिया।
अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि हाईकोर्ट के निर्देश के बाद जल संसाधन विभाग कर्मचारी की पुरानी सेवा, वेतन संरक्षण और पेंशन के मामले में तीन महीने के भीतर क्या निर्णय लेता है।

