पटना | विशेष रिपोर्ट
बिहार विधानमंडल का पांच दिवसीय मानसून सत्र सोमवार से शुरू हो रहा है। 24 जुलाई तक चलने वाले इस सत्र में सरकार जहां विकास कार्यों, योजनाओं और अनुपूरक बजट से जुड़े प्रस्ताव सदन में रखेगी, वहीं विपक्ष जनहित के विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। हालांकि इस बार का मानसून सत्र केवल विधायी कार्यवाही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कई राजनीतिक कारणों से भी बेहद अहम माना जा रहा है।
इस सत्र की सबसे बड़ी राजनीतिक खासियत यह है कि करीब 21 वर्षों बाद बिहार के किसी भी सदन में नीतीश कुमार की मौजूदगी नहीं होगी। लंबे समय तक मुख्यमंत्री के रूप में विधानसभा की कार्यवाही का नेतृत्व करने वाले नीतीश कुमार अब राज्यसभा सदस्य हैं। ऐसे में पहली बार सदन की कार्यवाही उनके बिना आगे बढ़ेगी, जिसे बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
विपक्ष की रणनीति पर उठ रहे सवाल
मानसून सत्र शुरू होने से पहले महागठबंधन के भीतर साझा रणनीति को लेकर स्पष्टता नहीं दिख रही है। राजद, कांग्रेस, भाकपा (माले), सीपीएम और सीपीआई के नेताओं की संयुक्त बैठक अब तक नहीं हो सकी है। राजनीतिक गलियारों में इसकी प्रमुख वजह नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की विदेश यात्रा और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के स्वास्थ्य संबंधी कारणों को माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विपक्ष एकजुट रणनीति बनाने में सफल नहीं होता है तो इसका लाभ सत्ता पक्ष को मिल सकता है।
तेजस्वी की अनुपस्थिति में कौन संभालेगा मोर्चा?
नेता प्रतिपक्ष की गैरमौजूदगी में विधानसभा में विपक्ष के मुख्य सचेतक कुमार सर्वजीत विपक्षी विधायकों के साथ रणनीतिक बैठक करेंगे। वहीं विधान परिषद में विपक्ष की ओर से अब्दुल बारी सिद्दीकी समन्वय की जिम्मेदारी संभालेंगे। विपक्ष का प्रयास रहेगा कि सदन के भीतर सरकार को विभिन्न जनहित के मुद्दों पर घेरा जाए।
पहले दिन पैदल मार्च की तैयारी
सत्र के पहले दिन विपक्ष नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं के मुद्दे पर प्रदर्शन करेगा। विपक्षी विधायक शहीद स्मारक (सप्त मूर्ति) से विधानसभा के मुख्य द्वार तक पैदल मार्च निकालकर सरकार के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराएंगे।
इन मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी
मानसून सत्र के दौरान विपक्ष कई अहम विषयों को सदन में उठाने की तैयारी कर रहा है। इनमें शामिल हैं—
,★ कम बारिश के कारण धान की रोपनी पर संकट।
★ किसानों को पर्याप्त बिजली नहीं मिलने का मुद्दा।
★ राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल।
★ पंचायतों में टैक्स व्यवस्था लागू करने का निर्णय।
★ कथित एनकाउंटर मामलों की जांच की मांग।
★ शिक्षक बहाली, रोजगार और बेरोजगारी का मुद्दा।
★ ग्रामीण विकास और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल।
सरकार के सामने भी होगी चुनौती
सरकार इस सत्र में अनुपूरक बजट, विकास योजनाओं और विभिन्न विभागों से जुड़े विधायी कार्यों को आगे बढ़ाना चाहेगी। लेकिन विपक्ष की ओर से उठाए जाने वाले मुद्दों के कारण सदन में तीखी बहस और राजनीतिक टकराव देखने को मिल सकता है।
ऐतिहासिक माना जा रहा यह सत्र
बिहार की राजनीति के लिहाज से यह मानसून सत्र कई मायनों में ऐतिहासिक माना जा रहा है। एक ओर 21 वर्षों बाद सदन में नीतीश कुमार की अनुपस्थिति नए राजनीतिक दौर का संकेत दे रही है, वहीं दूसरी ओर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की गैरमौजूदगी विपक्ष की रणनीति और एकजुटता पर भी सवाल खड़े कर रही है।
अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सदन में जनहित के मुद्दे ज्यादा प्रभावी साबित होते हैं या फिर राजनीतिक समीकरण पूरे सत्र की दिशा तय करते हैं।

