शराब पर रोक के बाद ड्रग्स का फैलाव तेज, सीमावर्ती इलाकों से लेकर शहरों तक सक्रिय नेटवर्क; युवा सबसे ज्यादा निशाने पर
पटना: बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुए करीब दस वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन इस दौरान नशीले पदार्थों का अवैध कारोबार लगातार विस्तार करता नजर आ रहा है। सरकारी आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि गांजा, स्मैक, हेरोइन, ब्राउन शुगर और प्रतिबंधित दवाओं की बरामदगी में पिछले एक दशक के दौरान कई गुना वृद्धि हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि शराब पर सख्ती के बाद नशे का स्वरूप बदल गया है और अब सिंथेटिक व अन्य ड्रग्स का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।
एक दशक में कई गुना बढ़ी बरामदगी
शराबबंदी से पहले वर्ष 2015 में बिहार में महज 14.37 किलोग्राम गांजा और 1.12 किलोग्राम हेरोइन जब्त की गई थी। इसके विपरीत वर्ष 2025 तक गांजे की बरामदगी लगभग 28 हजार किलोग्राम और हेरोइन करीब 60 किलोग्राम तक पहुंच गई। वहीं वर्ष 2026 में केवल मई तक ही पुलिस और अन्य एजेंसियों ने 21,024.37 किलोग्राम गांजा, 51.9 किलोग्राम हेरोइन/स्मैक, लगभग 3.45 लाख नशीले इंजेक्शन तथा 9 लाख से अधिक प्रतिबंधित गोलियां जब्त की हैं। ये आंकड़े राज्य में ड्रग्स नेटवर्क के तेजी से फैलने की ओर इशारा करते हैं।
नशे का बदलता पैटर्न बना चुनौती
जानकारों का कहना है कि शराब की तुलना में ड्रग्स की छोटी मात्रा को छिपाकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना आसान होता है। इसकी वजह से तस्कर कम जोखिम में बड़े पैमाने पर अवैध कारोबार संचालित कर रहे हैं। स्मैक की पुड़िया, नशीली गोलियां और प्रतिबंधित कफ सिरप जैसे पदार्थ कम कीमत पर उपलब्ध होने के कारण युवाओं में इनकी मांग भी बढ़ रही है। इसके बाद स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे सप्लाई नेटवर्क के जरिए इनकी पहुंच शैक्षणिक संस्थानों और कस्बों तक हो रही है।
सीमावर्ती जिले बने तस्करी का अहम मार्ग
नेपाल से लगी लगभग 700 किलोमीटर लंबी खुली सीमा का फायदा उठाकर तस्कर बिहार को ट्रांजिट रूट के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। किशनगंज, अररिया, मधुबनी, सीतामढ़ी और सुपौल जैसे जिले इस अवैध नेटवर्क के प्रमुख मार्ग बनते जा रहे हैं। इसके अलावा झारखंड, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों से भी नशीले पदार्थों की खेप बिहार पहुंचने की बात सामने आती रही है। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों के सामने इस संगठित नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई बड़ी चुनौती बनी हुई है।
युवाओं पर सबसे अधिक असर, स्वास्थ्य संकट भी गहरा
ड्रग्स का बढ़ता प्रचलन सबसे अधिक 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग को प्रभावित कर रहा है। बेरोजगारी, मानसिक तनाव और सामाजिक परिस्थितियों को भी इसके पीछे प्रमुख कारण माना जा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इंजेक्शन के माध्यम से नशा करने वालों में संक्रमित सिरिंज साझा करने की प्रवृत्ति गंभीर खतरा पैदा कर रही है। बिहार एड्स कंट्रोल सोसाइटी के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार राज्य में लगभग 1.06 लाख एचआईवी संक्रमित लोगों में 11,836 ऐसे मरीज हैं, जिनमें संक्रमण का संबंध नशे के दौरान एक ही सिरिंज के इस्तेमाल से जुड़ा पाया गया है।
बदलते खतरे से निपटने की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तस्करी पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। सीमाओं की निगरानी मजबूत करने, युवाओं में जागरूकता बढ़ाने, नशा मुक्ति केंद्रों को सशक्त बनाने और अवैध ड्रग्स नेटवर्क पर लगातार कार्रवाई के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर भी प्रभावी पहल की आवश्यकता है, ताकि बिहार को ‘सूखे नशे’ के बढ़ते संकट से बाहर निकाला जा सके।
रिपोर्ट : सुबी सिंह

