मिथिलेश मिश्रा !आखर प्रहरी न्यूज़ डेस्क
आरा। स्थानीय आरा ग्रैंड होटल के सभागार में भगवान शिव के गुरु स्वरूप पर विशेष आध्यात्मिक चर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वैश्विक शिव शिष्य परिवार के अध्यक्ष एवं साहब श्री हरिन्द्रानंद जी के ज्येष्ठ पुत्र अर्चित आनंद मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम में बिहार सहित विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे हजारों गुरुभाई-बहनों ने भाग लिया। इस दौरान वक्ताओं ने भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों में उनके गुरु स्वरूप की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला।

मुख्य वक्ता अर्चित आनंद ने कहा कि भगवान शिव के अनेक स्वरूपों में एक स्वरूप गुरु का भी है। उन्होंने कहा कि आरा की धरती का शिव शिष्य परिवार से विशेष आध्यात्मिक संबंध रहा है। इसी धरती पर साहब श्री हरिन्द्रानंद जी ने गांगी श्मशान में साधना के दौरान शिव को अपना गुरु मानने का संकल्प लिया था। उन्होंने बताया कि यह घटना 1970 के दशक की है। उसी समय साहब श्री हरिन्द्रानंद जी ने शिव को गुरु बनाने की बात को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया और लोगों को इस आध्यात्मिक पथ से जुड़ने की प्रेरणा दी।
अर्चित आनंद ने कहा कि जिस भगवान शिव को लोग मंदिरों में जाकर जल अर्पित करते थे और पूजा-अर्चना कर प्रसन्न करने की कामना करते थे, उसी शिव के गुरु स्वरूप को लेकर आज देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी लोगों के बीच चर्चा हो रही है। उन्होंने कहा कि करोड़ों लोग इस आध्यात्मिक अभियान से जुड़कर शिव को अपना गुरु मानने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
उन्होंने साहब श्री हरिन्द्रानंद जी के कथन “आओ चलें शिव की ओर” का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जनमानस को आध्यात्मिक दिशा देने वाला आह्वान था। साहब चाहते थे कि लोग किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि स्वयं शिव से जुड़ें। उन्होंने कहा कि आज साहब श्री हरिन्द्रानंद जी के इसी विचार के कारण प्रति सेकंड विश्व के अलग-अलग हिस्सों में लोग शिव के गुरु स्वरूप से जुड़ने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।

कार्यक्रम में रांची से पहुंचे गुरुभाई राजेश जी ने साहब श्री हरिन्द्रानंद जी के बाल्यकाल से लेकर उनके आध्यात्मिक जीवन तक के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि साहब बचपन से ही अध्यात्म की ओर गहरी रुचि रखते थे। उनका जन्म 31 अक्टूबर 1948 को सीवान जिले के अमलौरी गांव में हुआ था। उनके पिता विश्वनाथ सिन्हा बिहार सरकार के शिक्षा विभाग में निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए थे, जबकि माता का नाम राधा देवी था। वे अपने माता-पिता की प्रथम संतान थे।
राजेश जी ने बताया कि बचपन से ही साहब का झुकाव ध्यान, आध्यात्मिक गतिविधियों और संतों की चर्चाओं की ओर था। महज पांच वर्ष की उम्र में वे अपने साथियों के बीच आसन लगाकर बैठते और आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विषयों पर बातें करते थे। उनके आध्यात्मिक रुझान को देखते हुए परिवार में भी उनके व्यक्तित्व को लेकर चर्चा होती थी। उनके पिता चाहते थे कि वे उच्च शिक्षा प्राप्त कर जीवन में एक बड़ा मुकाम हासिल करें, लेकिन बाल्यकाल से ही उनका मन आध्यात्मिक साधना की ओर आकर्षित था।

कार्यक्रम में बक्सर से पहुंचे गुरुभाई सतीश जी ने साहब श्री हरिन्द्रानंद जी के विचारों और शिव के गुरु स्वरूप से जुड़ाव पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि समाज में शिव को गुरु मानने की प्रेरणा देने का श्रेय साहब श्री हरिन्द्रानंद जी को जाता है। उन्होंने कहा कि साहब का संकल्प था कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति शिव को अपना गुरु मान सकता है और इस विचार को जन-जन तक पहुंचाया जाना चाहिए।
सतीश जी ने कहा कि साहब के इसी संकल्प का परिणाम है कि आज बड़ी संख्या में लोग प्रतिदिन शिव चर्चा में शामिल होते हैं और शिव के गुरु स्वरूप पर विचार करते हैं। इस अवसर पर उन्होंने “कर लो शिव गुरु से प्यार, अमृत बरसेगा” भजन प्रस्तुत कर उपस्थित लोगों को भावविभोर कर दिया।वही शिव शिष्य रंजीत सिंह ,गुरुभाई दीपक कुमार ,गुरुबहनो द्वारा मनमोहक भजन प्रस्तुत किया गया।
कार्यक्रम का संचालन चांदी के गुरुभाई बीरेंद्र जी ने किया। कार्यक्रम समिति के अध्यक्ष अजय गुप्ता ने कहा कि यह धरती आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि आरा और आसपास का क्षेत्र उस भूमि से जुड़ा है जहां साहब श्री हरिन्द्रानंद जी ने साधना की और शिव को गुरु स्वरूप में स्वीकार करने का संकल्प लिया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन लोगों को आध्यात्मिक चिंतन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कार्यक्रम के दौरान सभागार में मौजूद गुरुभाई-बहनों ने शिव के गुरु स्वरूप पर चर्चा को ध्यानपूर्वक सुना। वक्ताओं ने कहा कि शिव को गुरु मानने का भाव केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ज्ञान, आत्मचिंतन और जीवन को बेहतर दिशा देने की प्रेरणा से जुड़ा है।
आयोजन को सफल बनाने में प्रमोद कुमार, अरुण कुमार उर्फ दारा, अजय दिवाकर, रवि सिन्हा, ललन जी, डॉ. अमरेंद्र, चांदी के संतोष जी, शंकर जी, प्रह्लाद जी, संतोष यादव, शिवम, दिवाकर, सुरेश जी, उमेश, विकास, दीपक, देवकुमार सहित सैकड़ों गुरुभाई-बहनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कार्यक्रम में हजारों की संख्या में श्रद्धालु एवं शिव शिष्य परिवार से जुड़े लोग उपस्थित रहे।

